सिवनी जिला कोतवाली में थाने में घुसकर पुलिस बल के साथ दुर्व्यवहार करने वाले भाजपा नेता का कारनामा
प्रति,
डॉ. मोहन यादव जी
माननीय मुख्यमंत्री,
मध्यप्रदेश शासन, भोपाल
विषय - पार्वती-काली सिंध-चंबल लिंक परियोजना के अंतर्गत चांचौड़ा/ कुंभराज (जिला, गुना) में घाटाखेड़ी के पास प्रस्तावित बांध से उद्भूत प्रश्नों/ चिंताओं के समाधान हेतु।
माननीय महोदय,
स्वतंत्रता के तत्काल बाद देश को खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बनाने की नीति की निरंतरता में दिसंबर 2024 में विषयांतर्गत लिंक परियोजना के अंतर्गत मध्यप्रदेश एवं राजस्थान सरकार के बीच जल बंटवारे का समझौता स्वागत योग्य है। इस संदर्भ में मैं केंद्र और प्रदेश सरकार को धन्यवाद प्रेषित करते हुए इस परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित बांधों से उद्भूत कुछ तकनीकी और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े प्रश्न और चिंताएं आपके संज्ञान में लाना अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य समझता हूं।
मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच समझौते में कुंभराज (I) और कुंभराज (II) नाम से दो बांधों का निर्माण प्रस्तावित है जिनका जलग्रहण क्षेत्र क्रमशः 5927 वर्ग किलोमीटर और 6458 वर्ग किलोमीटर तथा जल संग्रहण क्षेत्र क्रमशः 368.88 मिलियन क्यूबिक घन मीटर और 41.60 मिलियन क्यूबिक घन मीटर है।
यद्यपि बांधों का वास्तविक निर्माण स्थल तो परियोजना के विस्तृत प्रतिवेदन (DPR) तैयार होने पर ही ज्ञात हो सकेगा किंतु जलसंसाधन के विभागीय अमले की गतिविधियों से यह अनुमानित है कि दो बांधों के स्थान पर इनके संयुक्त जल संग्रहण, लगभग 400 मिलियन क्यूबिक घन मीटर का एक ही बांध घाटाखेड़ी (जिला गुना) के पास बनाया जाएगा।
इस बांध का आकार और स्थान चिंता का विषय है। क्योंकि इसके निर्माण से लगभग 10 हजार हेक्टेयर सिंचित कृषि भूमि और अनेक सरसब्ज गांव डूब में चले जाएंगे। औद्योगीकरण, शहरीकरण और आधुनिकीकरण के कारण कृषि भूमि लगातार कम होती जा रही है। ऐसी स्थिति में इस बांध में इतनी अधिक सिंचित कृषि भूमि को डुबाना किसानों को आत्महत्या की ओर धकेलने जैसा होगा।
इस संदर्भ में मेरे कुछ तकनीकी और प्रशासकीय विषयक सुझाव विचारार्थ प्रस्तुत हैं।
(1) परियोजना प्रतिवेदन बनाते समय जलग्रहण क्षेत्र में जल धाराओं पर छोटे-छोटे वॉटर रिटेनिंग स्ट्रक्चर बनाकर वर्षा जल का संग्रहण किया जाए ताकि भू-जल (ग्राउंड वाटर) रिचार्ज होता रहे तथा एक्यूफर आदि के रिसाव जल से मुख्य नदी के बहाव में भी इजाफा होता रहे। इस तरह वाटर शेड का लगभग 7000 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होकर लाभान्वित हो सकता है।
(2) मुख्य नदी पर एक या दो बड़े बांधों के स्थान पर तीन-चार स्वचालित द्वारों के पिक-अप वियर्स (Pickup Weirs) बनाए जाने चाहिए। इनके निर्माण से डूब क्षेत्र न्यूनतम होगा और लाभ यथावत रह सकेंगे।
चूंकि इस परियोजना में सिंचाई नहरों के माध्यम से न की जाकर लिफ्ट के द्वारा प्रेशराइज्ड पाइप से ही की जाना प्रस्तावित है, तो बड़े बांध बनाने का औचित्य प्रतीत नहीं होता है। पिक-अप वियर्स निर्माण से किसानों की कृषि योग्य भूमि को डूबने से बचाया जा सकता है तथा इनसे भी बड़े बांध की तरह ही लिफ्ट इरिगेशन की जा सकती है।
(3) प्रस्तावित बांध के केचमेंट एरिया में भी पार्वती नदी में मिलने वाले नाले व छोटी नदियों पर भी पिक-अप वियर्स के संयुक्त निर्माण पर भी विचार किया जा सकता है।
(4) कुछ वर्षों से जलसंसाधन विभाग में विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) का केंद्रीय जल आयोग और पर्यावरण मंत्रालय से अनुमोदन न लेने की परंपरा चल पड़ी है। यह स्पष्टतः वृहद परियोजनाओं के लिए बंधनकारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।
इस संदर्भ में मेरा निवेदन है कि विषयांतर्गत उल्लेखित परियोजना के क्रियान्वयन के पूर्व केंद्रीय जल आयोग से प्रारंभिक प्रतिवेदन (PFR) और विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तथा पर्यावरण मंत्रालय से पर्यावरण स्वीकृति (EC) का अनुमोदन प्राप्त करने के उपरांत ही इस परियोजना को क्रियान्वित करने पर विचार करने का कष्ट करें।
सादर।
आपका
(दिग्विजय सिंह)
प्रतिलिपि :-
(1) श्री सी.आर. पाटिल, माननीय मंत्री, जल शक्ति, भारत सरकार, श्रम शक्ति भवन, रफी मार्ग, नई दिल्ली की ओर सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित।
(2) चेयरमैन, केंद्रीय जल आयोग, भारत सरकार, तृतीय तल (साउथ), सेवा भवन, आर.के. पुरम, नई दिल्ली की ओर सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित।
(दिग्विजय सिंह)
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