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source: Dainik Bhaskar सरकारी स्कूलों का लगातार बंद होते जाना चिंता बढ़ाने वाला है: दिग्विजय सिंह जी
जून में कोटा में छात्रों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था के पतन के लिए तीन संरचनात्मक कारणों की पहचान की थी- निजीकरण, केंद्रीकरण और संघीकरण। उनके आंकलन से मैं सहमत हूं।
मैंने इसी वर्ष 21 जून को शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया। अपने दो वर्ष के कार्यकाल के दौरान समिति ने सर्वसम्मति से 22 अलग-अलग रिपोर्ट स्वीकार की। हमारी शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण पर निम्नलिखित मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, जिनमें से अनेक हमारी समिति की रिपोटों में भी प्रतिबिंबित हुए हैं।
पिछले एक दशक में हमारी शिक्षा व्यवस्था निजीकरण की दिशा में एक खराब मोड़ ले चुकी है। शिक्षा के लिए किए गए बजटीय आवंटन इस ट्रेंड का स्पष्ट प्रमाण हैं। मोदी सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग के बजटीय आवंटन का हिस्सा आधा कर दिया है- जो वित्त वर्ष 2014-15 में कुल बजट व्यय का 3.07 प्रतिशत था, वह वित्त वर्ष 2026-27 में घटकर 1.56 प्रतिशत रह गया है। उच्च शिक्षा के लिए आवंटन भी बजट के 1.54 प्रतिशत से घटकर 1.04 प्रतिशत रह गया है। इस अपर्याप्त निवेश ने निजी संस्थानों को खुली छूट दी है।
स्कूली शिक्षा के स्तर पर सबसे चिंताजनक घटनाक्रम लगभग एक लाख सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने की खबरें हैं। हालांकि, इस संबंध में कोई निश्चित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया कि वह स्कूलों के बंद होने का कोई रिकॉर्ड नहीं रखता। यह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। इन स्कूलों के बंद होने से प्रभावित छात्रों का भी कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है।
यह तर्क कि स्कूली शिक्षा मुख्यतः राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है और इसलिए स्कूलों के बंद होने के लिए मोदी सरकार जवाबदेह नहीं है, नैतिक दृष्टि से वजन नहीं रखता। वर्ष 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम छात्रों के निकट भौगोलिक क्षेत्र में स्कूल उपलब्ध कराने का प्रावधान करता है और भारतीय संविधान में निहित एक मौलिक अधिकार को प्रभावी बनाता है। स्कूलों के बंद होने के कारण इस अधिकार का जो मजाक बनाया जा रहा है, उससे सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती। बल्कि, मध्य प्रदेश और ओडिशा में स्कूलों को बंद करने की अवधारणा तैयार करने और उसे बढ़ावा देने का काम स्वयं नीति आयोग ने किया था।
संसदीय समिति ने पिछले वर्ष अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि भारत की सरकारी स्कूल व्यवस्था में लगभग 10 लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं। इन रिक्तियों के कारण ही बड़ी संख्या में मल्टी-ग्रेड कक्षाएं संचालित हो रही हैं, जहां शिक्षक प्रभावी ढंग से पढ़ाई नहीं करा पा रहे हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का स्थिर बजट भी उसे राज्य सरकारों को स्कूलों के बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश के लिए अधिक वित्तीय सहायता देने से रोकता है।
सरकारी स्कूलों के बंद होने और उनके बुनियादी ढांचे तथा शिक्षण व्यवस्था के लगातार कमजोर होने के दोहरे आघात के बीच, बड़ी संख्या में छात्र प्राइवेट स्कूलों की ओर पलायन कर रहे हैं। यही कारण है कि जहां एक ओर सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं, तो दूसरी ओर देश में लगभग 43,000 नए निजी स्कूल खुल गए हैं। ये स्कूल मध्याह्न भोजन, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों, निःशुल्क वर्दी जैसी सुविधाएं दिए बिना भी अत्यधिक फीस वसूलते हैं। सरकार के कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे एजुकेशन 2025 के अनुसार, निजी स्कूलों में पढ़ने वाले परिवारों का का खर्च भी सरकारी स्कूलों की तुलना में 10 गुना अधिक है।
(लेखक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पूर्व अध्यक्ष हैं)
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