History, battleground for politics

History, battleground for politics

The BJP is trying to appropriate the legacy of Congress leaders such as Nehru, Gandhi and Patel.Subramanian Swamy’s call for burning books written by Nehruvian historians is part of a larger conspiracy to underplay the contributions made by Nehru

The recent statement made by Subramanian Swamy calling for the burning of books written by Nehruvian historians is part of a larger conspiracy by the Sangh Parivar to underplay the contribution of Pandit Jawaharlal Nehru in India’s history. It has been a while since the Sangh began attempts to rewrite India’s history and now they feel they have a good opportunity to accomplish this since the Bharatiya Janata Party (BJP) has won a clear majority in the Lok Sabha election. The provocative statements made by Mr. Swamy — who has been owned, disowned and re-owned by the Sangh — are only a step towards reclaiming historical narratives to suit the right-wing group’s political agenda. Mr. Swamy’s statements, which are usually worth ignoring, cannot perhaps be overlooked for this reason

Pandit Nehru’s contribution to the freedom struggle under the leadership of Mahatma Gandhi and his vision for the country’s development is something which India can never forget. He was Gandhi’s chosen one in order to lead the nation after independence. Prime Minister Narendra Modi recently made a statement asking people to go on a cleanliness drive from November 14, the birth anniversary of Pandit Nehru to Indira Gandhi’s birth anniversary, November 19. This is probably the first time Mr. Modi has acknowledged the existence of the two great former Prime Ministers.

The problem with the RSS-BJP combine and their followers is that they don’t have any names worth mentioning among their leaders who might have contributed to the freedom struggle. That is probably the reason why they have been trying to appropriate the legacy of Gandhi, Netaji Subhash Chandra Bose and Sardar Patel among others. During the 1980s, the BJP under the leadership of Atal Bihari Vajpayee initiated the process of appropriating the doctrine of Gandhian socialism. The idea was to try and establish some relationship between their party and the freedom movement. This attempt, however, did not offer them any political advantage. As a result they reverted to hardcore religious fundamentalism and pursued the provocatively divisive issue of building a Ram temple in Ayodhya after the demolition of the Babri Masjid as their core political agenda. Later they tried to appropriate Patel as their leader and the Sangh Parivar propagated stories about the differences between Pandit Nehru and Sardar Patel.

In the run-up to the general election Mr. Modi constantly made references to building the iron statue of Sardar Patel. He even appealed to contribute iron in the same way that they sought contributions of bricks for constructing the Ram Mandir. But now that he is the Prime Minister of the country, we have not heard much about the massive “Loh” statue of “Loh Purush” Sardar Patel.

Modi, the statesman

After coming to power, Mr. Modi is trying hard to distance himself from the hardcore religious and fundamentalist ideology in which he had been trained and associated with since the beginning. In his attempt to project himself as a statesman, he has been making statements in favour of Indian Muslims and also appealed from the Red Fort for communal harmony in the country.

But can a leopard conceal its spots?

The game plan of the RSS-BJP combine to achieve a “Congress Mukt Bharat” is to capture the central space in national politics presently occupied by the Congress. At the same time marginal players like Mr. Swamy who are part of the RSS-BJP fraternity are being allowed to rake up their divisive agenda. Those who have been accused of indulging in communal riots are being honoured by the current dispensation. Provocative statements are allowed to be made by the cadre of right-wing groups.

Every small incident of tensions between local communities is being blown out of proportion and given a communal colour. The strategy of the RSS-BJP combine is to demolish the contributions made by the Nehru-Gandhi family during the freedom movement and building a new India post-independence. Their agenda is clearly to further polarise politics.

But several important questions need to be raised at this point. Would the saner elements in Indian society allow this to happen? Would we remain silent spectators while the RSS-BJP combine distorts Indian history? The thing to watch for is how Mr. Modi will tackle people like Mr. Swamy, Yogi Adityanath and other fringe elements within the RSS-BJP fraternity in order to emerge as a true national leader. Or would he surreptitiously allow these players to further polarise politics?

नए हुक्मरानों की विभाजक राजनीति और जवाहरलाल नेहरू की विरासत

आमतौर पर सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन नेहरू के अनुयायी इतिहासकारों की किताबों को जला देने वाला उनका बयान उनके अन्य बयानों से थोडा अलग है . यह संघ की उस योजना का हिस्सा है जिसके अनुसार भारत के इतिहास में नेहरू जी के योगदान को कमतर करके पेश करने की साज़िश रची गयी है

संघ वाले बहुत दिनों से इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रहे हैं और अब उनको लगता है कि अब वक़्त आ गया है कि वे अपने मंसूबों को अमली जामा पहना दें. ऐसा शायद इसलिए है कि केंद्र में उनको स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने का मौक़ा मिल गया है . उनको लगता है कि स्पष्ट जनादेश के बाद वे कुछ भी कर सकते हैं , यहाँ तक कि इतिहास भी बदल सकते हैं

महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुई भारत की आज़ादी की लड़ाई में पं जवाहरलाल नेहरू का जो योगदान है उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता . उनको महात्मा गांधी ने खुद अपना उत्तराधिकारी चुना था और उनको राष्ट्र के नेतृत्व का ज़िम्मा दिया था .

सुब्रमण्यम स्वामी भारतीय राजनीति में एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनको कभी संघ अपना लेता है , कभी दुत्कार देता है और दोबारा फिर अपना लेता है . वे अक्सर भड़काऊ बयान देते रहते हैं जिन्हें आमतौर पर नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान दिया और कहा कि पं जवाहरलाल नेहरू की जयन्ती १४ नवम्बर से इंदिरा जी के जन्मदिन १९ नवम्बर तक देश में स्वच्छता अभियान चलाया जाएगा . यह शायद पहली बार हो रहा है कि नरेंद्र मोदी ने इन दो महान प्रधानमंत्रियों के अस्तित्व को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है .

आर एस एस /बीजेपी मंडली की समस्या यह है कि उनके अपने नेताओं में ऐसा कोई भी नहीं है जिसने स्वतंत्रता के संघर्ष में कोई भी योगदान किया हो .इसीलिए उनकी कोशिश चल रही है कि कांग्रेस के महान नेताओं ,महात्मा गांधी , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और सरदार पटेल की विरासत को अपना लें

१९८० के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में बीजेपी ने गांधीवादी समाजवाद के सिद्धांत की बात की और उसी के ज़रिये महात्मा गांधी से सम्बन्ध बनाने की कोशिश शुरू कर दी .इसी बहाने आजादी की लड़ाई से किसी तरह संघ के संबंधों को स्थापित करने की कोशिश की जानी थी.

यह कोशिश बेकार गयी क्योंकि उनको इस प्रयोग से कोई राजनीतिक लाभ नहीं हुआ.नतीजा यह हुआ कि वे घोर साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्माद पर आधारित अपनी राजनीति की तरफ फिर वापस चले गए और राम जन्मभूमि/ बाबरी मस्जिद के विभाजक एजेंडा को फिर से लागू करने की राजनीति शुरू हो गयी .

उसके बाद सरदार पटेल को अपना बनाने का अभियान शुरू हुआ . इस बीच जोर शोर से प्रचार किया गया कि पं जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल में भारी मतभेद थे . इतिहास का कोई भी जानकार बता देगा कि ऐसा कुछ नहीं था. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी सरदार पटेल की एक बहुत ही विशाल मूर्ति की स्थापना की बात करते रहते थे . यहाँ तक कि उन्होंने जनता से भी लोहा दान करने की अपील कर डाली जैसे राम मंदिर के नाम पर गाँव गाँव से ईंटें मंगवाकर किया गया था. अब वे देश के प्रधानमंत्री हैं लेकिन अब वे लोह पुरुष सरदार पटेल की लौह प्रतिमा की बात नहीं कर रहे हैं .

इन दिनों नरेंद्र मोदी धार्मिक बुनियादपरस्त राजनीति से अपने दूर करने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं . यह अलग बात है कि उनकी ट्रेनिंग विभाजक राजनीति के लिए ही हुयी है . अपने आपको स्टेट्समैन साबित करने के चक्कर में वे भारतीय मुसलमानों के पक्ष में भी बयान देते पाए जा रहे हैं . यहाँ तक कि उन्होंने लाल किले के अपने संबोधन में भी देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की अपील कर डाली .

लेकिन सवाल यह है कि क्या तेंदुआ अपना रंग बदल सकता है ?

आर एस एस /बीजेपी की योजना यह है कि कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देकर वे राष्ट्रीय राजनीति में वह मुकाम हासिल करना चाहते हैं जहां हमेशा से ही कांग्रेस विराजमान है .

जबकि संघ की मंडली के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे हाशिये पर पड़े लोग संघ के विभाजनकारी एजेंडे को चलाने के लिए छोड़ दिए गए हैं इसी क्रम में साम्प्रदायिक दंगों के अभियुक्तों को सम्मानित किया जा रहा है . संघ /बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भड़काऊ बातें कहने की आज़ादी दे दी गयी है .

हर घटना को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है . आर एस एस / बीजेपी की कोशिश है कि नेहरू गांधी परिवार के स्वतंत्रता संग्राम और नए भारत के निर्माण में किये गए योगदान को कम कारके पेश किया जाए. इनका एजेंडा है कि राष्ट्रीय राजनीति का और अधिक ध्रुवीकरण कर दिया जाए.

प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज के ज़िम्मेदार लोग ऐसा होने देगें.क्या आर एस एस / बीजेपी मंडली इतिहास और इतिहास के अध्ययन की तरकीबों को बर्बाद करने में सफल हो पायेगी. देखना यह है कि एक राष्ट्रीय नेता बनने की कोशिश में ,नरेंद्र मोदी जी सुब्रमण्यम स्वामी और महंत आदित्यनाथ जैसे लोगों को कैसे हैंडिल करते हैं .क्या इनको रोका जाएगा या इन्हें गुपचुप तरीके से संघ के विभाजनकारी एजेंडे पर काम करने के लिए बेलगाम छोड़ दिया जायेगा और यह देश की राजनीति का ध्रुवीकरण करते रहेगें . सबको मालूम है कि दो तरह की बातें करने में आर एस एस/ बीजेपी के टक्कर का कोई भी संगठन नहीं है